नीमच में रमज़ान के मुबारक महीने के बीच एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो सिर्फ खबर नहीं… एहसास है। पेशे से पत्रकार तबरेज़ अगवान के घर अलसुबह करीब तीन बजे सेहरी की तैयारी चल रही थी। घर में हल्की रोशनी, रसोई से आती खुशबू, और रोज़े की नीयत का सुकून… तभी अचानक छोटे कदमों की आहट हुई। तीन साल दस महीने की नन्हीं ज़हरा फातिमा नींद से उठकर बाहर आई। आँखें अभी भी अधखुली थीं, लेकिन जिज्ञासा पूरी जागी हुई। उसने पूछा - आप क्या कर रहे हो? माँ-बाप ने मुस्कुराकर कहा - रोज़ा रख रहे हैं, दिनभर कुछ नहीं खाएंगे, शाम को इफ्तार करेंगे। इतना सुनते ही ज़हरा ने बिना एक पल गंवाए कहा — मैं भी रोज़ा रखूंगी। घरवालों को लगा बच्चों वाली बात है… लेकिन उस मासूम ने बात को खेल नहीं बनने दिया। उसने बाकायदा सेहरी की — दाल-रोटी खाई, दूध पिया, खजूर लिया… और पूरे आत्मविश्वास से बोली — मैंने रोज़ा रख लिया। सुबह जब बाकी बच्चे नाश्ते की जिद करते हैं, उस वक्त ज़हरा से पूछा गया — कुछ खाओगी? उसका जवाब साफ था — मेरा रोज़ा है। दिन चढ़ता गया। कभी पानी की पेशकश हुई, कभी फल… लेकिन हर बार वही जवाब - मेरा तो रोज़ा है। ना रोना, ना शिकायत, ना जिद। शाम ढलने लगी, अज़ान का वक्त करीब आया… और एक नन्हीं सी बच्ची ने मुस्कुराते हुए अपना पहला रोज़ा मुकम्मल कर लिया। इस्लाम में रोज़ा बालिग होने के बाद फर्ज होता है, लेकिन कम उम्र में इबादत की यह चाह, यह अभ्यास… घर के माहौल और परवरिश की गवाही देता है। ज़हरा की यह कोशिश सिर्फ एक रोज़ा नहीं, बल्कि उस मासूम दिल का ऐलान है — कि इबादत उम्र नहीं देखती, नीयत देखती है। रमज़ान रहमत, बरकत और सब्र का महीना है… और नीमच की यह नन्हीं बच्ची आज उसी सब्र की सबसे प्यारी तस्वीर बन गई है