नीमच(न.प्र.) प्रदेश में पहली बार एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का परमाकल्चर डिजाइन कोर्स (पौडीसी) रूट्स टू रूट्स (रास्ते से जड़ तक) आयोजित किया गया। यह ग्राम सरवानिया बोर में संमपन हुआ। इसमें भारत के साथ डेनमार्क, जर्मनी, अमेरिका और लंदन (यूके) से आए प्रतिभागियों ने भाग लिया। यह कोर्स भारत से संगम अग्रवाल (रूट्स दू रूट्स नेचरल फार्मूस के संस्थापक व परमाकल्चर विशेषज्ञ) तथा यूनाइटेड किंगडम से राकेश रूट्समेन एक (अंतरराष्ट्रीय परमाकल्चर प्रशिक्षक) के मार्गदर्शन में संचालित हुआ। दौरान प्राकृतिक खेती, जल व मिट्टी संरक्षण, बीज स्वराज और सतत इस जीवनशैली पर व्यावहारिक जानकारी दी गई 7 एकड़ में विकसित यह परमाकल्चर फार्म पहले बजर चारागाह था। इसे आज जैव विविधता का जीवंतं मॉडल बना दिया है। यहां देसी चीजों से उगाई सब्जियां, फलदार वृक्ष, दालें, औषधीय पौधे और फूलों की अनेक प्रजातियां मौजूद हैं। फार्म परिसर में पक्षियों की 68 से अधिक प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इनमें ब्लुबोट, इंडियन हॉर्नबिल, पाइड किंगफिशर, पेंटेड स्टॉर्क और सारस क्रेन जैसे दुर्लभ पक्षी भी शामिल हैं। आयोजकों के अनुसार यह पहल प्रदेश को वैश्विक परमाकल्चर मानचित्र पर नई पहचान दिलाएगी और भविष्य में प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने में अहम भूमिका निभाएगी। -प्राकृतिक खेती की प्रेरणा कहा से एवं केसे मिली, -इसकी तकनीक कहाँ से प्राप्त की, -वर्माकल्चर की प्रेरणा से क्या क्या किया, आपका फार्म नीमच से कितनी दूर है क्या क्या है। आदि प्रश्नों के उत्तर मे बताया कि वणिक परिवार में जन्म लेकर आधुनिक तकनीक और परंपरागत खेती के संगम से नई राह बनाने वाला संगम अग्रवाल आज आत्मनिर्भर तो हैं ही साथ ही सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणा भी चन चुका है। अपनी उच्ब शिक्षा के बाद खेती की और लौटना आसान फैसला नहीं था, लेकिन जैविक खेती के प्रति जुनून और सीखने की लगन ने चुनौती को अबसर में बदल दिया। सीमित भूमि से शुरू हुआ यह सफर आज जैविक खेती, वर्मी कंपोस्ट पशुपालन और प्रशिक्षण के माध्यम से लाखों के नवाचार मॉडल में बदल चुका है। संगम मूल रूप से एक व्यापारी परिवार से है पढ़ाई के दौरान उन्होंने कॉलेज से केमिकल इंजीनियरिंग में धीरे धीरे जैविक खेतों की शुरुआत की। जैविक खेती को लेकर जानकारी का अभाव था और प्रयोग का जोखिम भी। इसी कारण उन्होंने इंदौर, भोपाल सहित विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण लिए छोटे से हिस्से में प्रयोग करते हुए उन्होंने नीमास्त्र ब्रह्मास्त्र अग्याम्व जैसे जैविक कीटनाशक जीवामृत जैसे टॉनिक और वर्मी कंपोस्ट बनाकर उपयोग शुरू किया। परिणाम स्वरूप मिटटी की गुणवत्ता सुधरी, उत्पादन बढ़ा और परिवार का भरोसा भी मजबूत हुआ। यही विश्वास आगे चलकर पूरे खेत को जैविक खेती में बदलने की नींव बना पडोसी किसान इन दवाइयों और तकनीक को देखने लगे और उनसे सीखने की इच्छा जताई। उन्होंने बिना किसी शुल्क के किसानों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। धीरे-धीरे यह पहल क्षेत्रीय पहचान बनाने लगी। आज उनकी जैविक खाए, वर्मी कंपोस्ट और जैविक दवाइयों की मांग न केवल मध्य प्रदेश बल्कि अन्य राज्यों तक पहुंच चुकी है। जैविक खेती से लागत घटी और आय बढ़ी लगभग सात एकड भूमि पर पूरी तरह जैविक खेती अपनाने के बाद बदलाव स्पाट दिखाई देने लगा। रासायनिक खेती में जहां खाद और दवाइयों पर भारी खर्च आता था, वहीं जैविक खेती में तैयार खाद और दवाइयों से लागत में कमी आई। मिट्टी को संरचना पहले की तुलना में भुरभुरी और उपजाऊ में वृद्धि हुई। जैविक उत्पाद से बेहतर दाम मिलने लगे। साथ ही जैविक कीटनाशक व टॉनिक की मांग किसानों में बढ़ने लगी।