KHABAR : सुदामा ने ग़रीबी का कष्ट स्वीकार किया लेकिन अपने स्वाभिमान को नहीं छोड़ा- पुष्कर नागदा महाराज ,पढ़े MP44 NEWS खबर

MP44NEWS April 2, 2026, 6:59 pm Technology

नीमच2 अप्रैल, (केबीसी न्यूज़) कृष्ण सुदामा के मित्रता का संसार में कोई सानी नहीं है। सुदामा ने जीवन पर्यंत दरिद्रता और गरीबी को अपना लिया था लेकिन कृष्ण से कभी नहीं कहा कि वह उनकी सहायता करें, सुदामा स्वाभिमानी थे, उन्होंने जीवन पर्यंत कष्ट सहन कर कृष्ण के दुखों को अपना दुःख बना लिया था फिर कृष्ण ने भी समय आने पर अपना ऋण उतार दिया और सुदामा को दो लोक की खुशियों का राज दे दिया था। यह बात पुष्कर नागदा महाराज ने कही। वे बालाजी कुड़ी हनुमान मंदिर मंदिर में आयोजित गवत ज्ञान गंगा के अंतिम दिवस बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कृष्ण और सुदामा की मित्रता में अमीरी गरीबी की दीवार नहीं थी।भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के अंतिम दिन पूर्णाहुति हुई। भागवत ज्ञान गंगा कथा के भवसागर में श्रद्धालुओं ने डुबकियां लगाई। व्यास पीठ पर विराजित गौ भक्त कथा मर्मज्ञ पुष्कर नागदा महाराज ने कहा कि कृष्ण सुदामा की मित्रता आधुनिक युग में आज भी आदर्श प्रेरणादायक है। इस अवसर पर द्वारकाधीश की जय जय कार लगाई गई।कथा आयोजक समिति की ओर से कथा मर्मज्ञ शास्त्री, यज्ञाचार्य पंडित व्यास मंच पर विराजित अत्याधुनिक वाद्य यंत्र के कलाकारों को शाल भेंट कर सम्मानित किया गया। । कृष्ण लीला की कथा के अंतिम दिन चल रही भागवत कुंभ में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त उपस्थित थे। कथा मर्मज्ञ पंडित पुष्कर नागदा महाराज ने भक्ति रस का प्रवाह करते हुए कहा कि सुदामा ब्रह्मज्ञानी थे, सुदामा जानते थे कि गुरु माता द्वारा दिए गए चने श्रापित हैं फिर भी उन्होंने अपने मित्र कृष्ण के ऊपर दरिद्रता ना आए स्वयं ने श्रापित चने खा लिए और स्वयं ने दरिद्रता अपने ऊपर लेली।हम चाहे कितनी अच्छे‌ क्यो नही हो, संसार के लोगों का कोई भरोसा नहीं होता है उन्होंने तो सीता माता को भी अग्नि परीक्षा के लिए मजबूर कर दिया था। कृष्ण और जामवंत का 27 दिन युद्ध चला था। पति की सेवा करना पत्नी का कर्तव्य होता है। यदि पत्नी बीमार हो तो पति भी सेवा कर सकता है इसमें कोई अपराध नहीं होता है। जिसका कोई नहीं होता उसके दीनानाथ कृष्ण होते। भक्तों की रक्षा के लिए कृष्ण किस‌ किस रूप में प्रकट हो जाते है। कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए थे। सिर्फ पांच गांव मांगे थे। पांडवों के लिए वह भी दुर्योधन ने स्वीकार नहीं किये थे। निर्दोष होने के बाद भी कृष्ण को यदुवंश नष्ट होने का श्राप गांधारी ने दे दिया था। महर्षि दधिचि जी ने संसार के कल्याण के लिए अपनी हड्डियों का दान दे दिया था। संसार में शिक्षा प्रदान करना प्रत्येक ब्राह्मण का कर्तव्य होता है । कृष्ण ने सांदीपनी गुरु के यहां प्राचिन अवंतिका नगरी उज्जैन में 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। गुरु के लिए सभी शिष्य समान होते थे। भारत देश में ऐसे कानून भी चल रहे हैं निर्दोषी होने पर भी सजा मिल जाती है। जब महाराज नेकृष्ण सुदामा मिलन का प्रसंग बताया जिसमें कृष्ण ने भाव विह्वल होकर सुदामा के चरण आंसुओं से धुलाएं। कृष्ण ने सुदामा की पत्नी सुशीला द्वारा भेजे गए दो मुट्ठी चावल में को ग्रहण कर लिया था। तीसरी मुट्ठी चावल भी हाथ में लेने लगे तो रुक्मणी ने हाथ पकड़ कर रोक दिया और कहा कि दो लोक की खुशियों का दान तो दे दिया अब एक लोक अपने लिए भी रख लो, यह नैना विराम दृश्य सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गई। कृष्ण ने सुदामा की गरीबी दूर करने के लिए भगवान विश्वकर्मा से झोपड़ी के स्थान पर सोने के महल बनवा दिये थे। सुदामा ने कृष्ण से प्रार्थना की थी कि जो कृष्ण करते है वहअच्छा ही करते हैं। जहां धन सम्पत्ति ,सत्ता ,दौलत होती है। इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।मन पानी की तरह है। हमेशा नीचे की तरफ बहता है। गुरु के बिना जीवन अधूरा होता है।कथा प्रवचन के अंतिम दिन हवन पूजन एवं आरती के साथ प्रसाद के रूप में किया गया इसी के साथ साप्ताहिक भागवत ज्ञान गंगा प्रवचन की पूर्णाहुति के साथ कथा का विश्राम हुआ। आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया। आरती में भगवताचार्य मनोहर लाल नागदा, भाजपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पवन पाटीदार,घनश्याम शर्मा, विकास आदि ग्रामीण बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस अवसर पर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त उपस्थित थे। इस अवसर पर मेले का आयोजन भी किया गया मेले में खेल खिलौने की दुकानों के स्टॉलों पर ग्रामीणों ने अपार उत्साह दिखाया। बच्चों ने झूले चकरी में आनंद लिया।

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