सिंगरौली नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान ने कैंसर से जूझ रही एक बिटिया के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए अपने बाल मुंडवा लिए। उपचार के कारण बाल झड़ने से वह मासूम स्वयं को सबसे अलग और अकेला महसूस कर रही थी। सविता प्रधान ने उससे पूछा— “यदि मैं भी तुम्हारी तरह दिखने लगूं, तो क्या तुम्हें खुशी होगी?” बिटिया ने ‘हां’ कहा और उस एक ‘हां’ के लिए उन्होंने जो किया, वह केवल त्याग नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की जीवंत मिसाल बन गया। अधिकारी बनने के बाद कई लोग अपने भीतर की कोमलता को पद और प्रोटोकॉल की परतों में छिपा लेते हैं, लेकिन सविता प्रधान की विशेषता यही है कि उनका पद बढ़ता गया, पर उनकी मानवीयता कभी छोटी नहीं हुई। उन्होंने इस कार्य का प्रचार नहीं किया, क्योंकि कुछ कार्य प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और किसी का दर्द बांटने के लिए किए जाते हैं। समाज अक्सर महिलाओं की सुंदरता को लंबे बालों, रंग-रूप और आभूषणों के तराजू पर तौलता है। सविता प्रधान ने इस रूढ़ सोच को भी एक सहज चुनौती दी है। उन्होंने सिद्ध किया कि सुंदरता केशों या आभूषणों में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, करुणा और मनुष्य के कर्मों में बसती है। मुझे व्यक्तिगत रूप से उन पर इसलिए भी गर्व है कि नीमच में पदस्थ रहने के दौरान जब भी उनसे मिलने का अवसर मिला, उन्होंने मुझे हमेशा बड़े भाई जैसा सम्मान और आत्मीयता दी। आज अपनी इस बहन के संवेदनशील और मानवीय स्वरूप को देखकर मेरा हृदय सचमुच गौरवान्वित है। बाल हटाना आसान था, लेकिन एक मासूम के मन से अकेलेपन का एहसास मिटाना असाधारण है। सविता प्रधान ने बता दिया कि प्रशासन केवल नियमों और आदेशों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और मानवीय स्पर्श से भी चलता है। उस संवेदनशील अधिकारी को हृदय से नमन, जिनके मस्तक पर भले ही केश न हों, लेकिन सेवा, करुणा और सनातन संस्कारों का तेज पहले से कहीं अधिक दमक रहा है।